हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।। To him who sees with a finger stuck into his eyes the moon appears as doubled . The mirror of their heart is soiled and they have no eyes to see; how -then, can those wretched sould behold the beauty of Sri Rama? –*–*– एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा।। jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram Doha - 118 पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही।।

महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना।।

सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा।। jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर।। पुनि प्रयास बिनु सो तनु जजेउँ गएँ कछु काल।।109(ख)।। bhagawan aap ko lambi aayu pradan karen सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम। सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना।। आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा।। दो0-तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर। प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी।। He is the Lord whose very benig is light ; there is no dawn of understanding in His case (For the dawn persupposes night and night there is none in the sunlight of Sri Rama). बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ।।18(ख)।। श्लोक छं0-बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए। करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना।। दो0-तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह। Even so the story of Rama is an axe to the tree of Kaliyuga (the impurities of the Kali age); listen to it with reverence, O daughter of the mountain-king . कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी।। संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि।।45।। sabse phle mai apko dhanywad de raha hun ki aapne ham garib logo ka bhi dhyan rakha. यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा।। For such monarchs as prove a source of annoyance to hermits and ascetics are consumed without fire. मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।।6।। jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता।। अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब।।87(ख)।। करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।। काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई।। तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई।।

दो0-बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु। पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए।। महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका।।

श्रीरामचरितमानस

संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ।।92(क)।। ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें।।

कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ। रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी।। महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।।

–*–*–

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।

काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ।। To him who sees with a finger stuck into his eyes the moon appears as doubled . Don't be intentionally ignorant.

भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित।।

मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए।। छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि।।71(ख)।। रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी।। श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि। Ask us!! परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस।।104(ख)।। आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा।। श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत।।127।। गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुन्दर भूरी।।

All that You say or do is ture; for one should play the role one has assumed on the stage. " कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी।।

In the same vein the villagers discussed what purpose are various attires and ornaments given for by the maker of this world if these divinely beautiful and tender young people have to be clad like Munis and keep their lock of hair tied over their heads. With this view in mind who keep company of saints do easily get the flavor of Ram’s Bhakti, O Great Bird. कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग।।85(ख)।। भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक।। जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि।। एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते।। जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ।। –*–*–

ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं।। Clasping the lotus-feet of her lord again and again, and joining her lotus-like palms, Parvati spoke the following fine words, them as it were in the nectar of love:-, ''Now that I have listened to Your words, which were refreshing as moonbeams, my ignorance, like the feverish heat of the autumnal sunshine , has faded away , You have removed all my doubt, O gracious Lord , and the reality of Rama has been revealed to me.By Your grace, my lord my gloom has been lifted and I feel happy now by the blessing of my lord's feet Now, regarding me as Youre slave , even though I am a woman, ignorant and stupid by nature, answer my former question , if You are indestructible Brahma (God), who is consciousness itself and who though bereft of all, yet dwells in the heart of all. jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram

सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई।। तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कलपहि घालइ हरहाई।। नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई।। नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।। Chaupala - एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी।। ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना।। अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने।। संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता।। बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि। "Compliance with my father's commands gratification of my stepmother (Kaikey)the installation of a brother like Bharata to the throne and my seeing you-all this, my lord, is the result of my meritorious acts. सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेऊँ।। पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका।। राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा।। अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी।। दो0-राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत। न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर।।115(क)।। हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ।।10(ख)।। II Sri Ram Jai Ram Jai Jai Ram II –*–*– त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।। जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।। "And who having done all this ask only one boon as their reward: "Let me have devotion to Sri Rama's feet!" The naturally knowledgeable and wise Lord Shankar (who had Himself first conceived of Ramkatha and discovered its importance without an outside source hence He is naturally wise and knows all), the annihilator of Kama (who demonstrated that Kama i e desires can’t have any impact on His mind or remain alive in any form before Him), became amused and extolled Uma in many ways and started speaking again. बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन।। If men repeat His Name even in a helpless state, sins committed by them in a series of previous existences are burnt away; while those who devoutly remember Him are able to cross the ocean of mundane existence as if were a mere hollow made by the hoof of a cow .

jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं।। दो0-कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।। कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।। दो0-ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार। –*–*– बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं।। कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।। तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए।। बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि। –*–*– कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि।।2(ख)।।

अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना।। जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै।। We have now covered up to Doha 120 of Ayodhya Knad in Ramchari Manas of Tulsidas. सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना।। jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि।। प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।। It is by Your grace, O Delighter of Raghus, that Your votaries come to know You, O Comforter of the heart of devotees. Displaying their capability of identifying the spiritual status of these divine wayfarers some said, “These must not have been created by Brahma and have just manifested on their own; only that far the Vedas say that the creator Brahma’s creation extends and which exits visibly, audibly and even imaginably, all those 14 spheres may one search over but no where one can find such (charming) man or woman. नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन।। तेहि न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक।।100(ख)।। राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।। मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग। कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई।।

चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।।89(ख)।। जो चेतन कहँ ज़ड़ करइ ज़ड़हि करइ चैतन्य। एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।। पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना।। AVAM MATA JANKI AAP SABHI KI MANOKAMNAYEIN PURI KAR. दो0-बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज। तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया।। jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram The whole world knows it. कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना।। कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनंगमोचनम्।।3।। किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।120।।, Displaying their capability of identifying the spiritual status of these divine wayfarers some said, “These must not have been created by Brahma and have just manifested on their own; all that far the Vedas say that the creator Brahma’s creation extends and which exits visibly, audibly and even imaginably, all those 14 spheres may one search over but no where one can find such (charming) man or woman. नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना।। सो0-पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं। कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह।।77(ख)।। सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म।।97(ख)।। संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल। पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा।। कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला।। jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई।। एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं।। The lotuses in the ponds and the trees in the woods were in blossom; intoxicated with their bees seetly hummed over them. श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग।।86।। –*–*– राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें।। अस समर्थ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते धन्य।।119(ख)।। jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक। jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram jai shri ram देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई।। दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।। Again those who are ever engaged in muttering the Rama-Mantra ( श्रीरामय नम :), the king of all sacred formulas, and worship You along with Your associates; who offer water to the manes and pour oblations into the sacred fire in diverse way, who feed the Brahmanas and bestow liberal gifts on them and who look upon their preceptor as greater than Yourself and wait upon him with due honour and entire devotion; ---". सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर। सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी।। बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर।।28।।

रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई।। धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।। सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा।। ", "Nay, You should dwell in the heart of him whose swan-like tongue picks up pearls in the shape of Your virues in the holy Manasarovar lake of Your fame. मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।।



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